रक्षाबंधन की कहानी इन हिंदी । रक्षाबंधन का इतिहास




रक्षाबंधन का इतिहास

1905 का बंग भंग और रवींद्रनाथ टैगोर-

भारत मे जिस समय अंग्रेज अपनी राज जमाये रखने के लिए divide and rool कि policy अपना रहे थे, उस समय रवींद्रनाथ टैगोर ने लोगो मे एकता के लिये रक्षाबंधन का पर्व मनाया।

वर्ष 2005 में बंगाल की एकता को देखते हुए ब्रिटिश सरकार बंगाल को बांट तथा हिन्दू और मुस्लिम एकता बनाये रखने में लिए और पूरे भारत मे एकता संदेश देने के लिए रविन्द्र नाथ टैगोर ने रक्षाबंधन का पर्व मनाना शुरू किया।

सिकेन्द्र और राजा पुरु:-

एक महान इतिहासिक घटना के अनुसार जब 326 ई पूर्व सिकन्दर ने भारत मे प्रवेश किया, सिकेन्द्र की पत्नी रोशनक ने राजा पोरस को एक राखी भेजी और उनसे सिकेन्द्र पर जानलेवा हमला न करने का वचन लिया।

समय के अनुसार कैकेय के राजा पोरस ने युद्ध भूमि में जब अपनी कलाई पर बंधी हुई राखी देखी तो सीकेन्द्र पर व्यक्तिगत हमले नही किये।


रक्षाबंधन का इतिहास

सिखों का इतिहास-

18वीं शताब्दी के दौरान शिख खालसा आर्मी के आरविंद सिंह ने राखी नाम से एक प्रथा का आविर्भाव किया, जिसके अनुसार सिख किसान अपनी उपज में से कुछ भाग मुस्लिम आर्मी को देते थे, और इसके एवज में मुस्लिम आर्मी ने उन पर हमला नही करते थे।

इतिहास के पन्नो से-
रक्षाबंधन की शुरुआत का सबसे पहला साक्ष्य रानी कर्णवती का सम्राट हुमायूं है। मध्यकलिन युग मे राजपूत व मुस्लिम के बीच संघर्ष चल रहा था। रानी कर्णवती चितौर के राजन की विधवा थी , उस दौरान गुजरात के सुल्तान बहादुर शाह से अपनी प्रजा की सुरक्षा का कोई रास्ता नही था उसे देखकर रानी ने हुमांयू में राखी भेजी थी,तब हुमायूं ने उनकी रक्षा कर उन्हें बहन जा दर्ज दिया था।


कृष्ण और द्रौपदी-
कृष्ण भगवान ने दुष्ट राजा शिशुपाल को मार था , युद्ध के दौरान कृष्ण के बाएं हाथ की अंगुली से खून बह रहा था , इसे देखकर द्रौपदी बहुत दुखी हुई, और उन्होंने अपने सारी का टुकड़ा चीरकर कृष्ण के अंगुली में बांध दिया, जिससे उनका खून बहना बंद हो गया, तभी से कृष्ण ने द्रौपदी को अपना बहन स्वीकार कर लिया।

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